बोले भारत टाइम्स, डेस्क: बिहार की राजनीति में एक बार फिर हलचल की स्थिति है। यह सवाल उठ रहा है कि क्या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एनडीए का साथ छोड़कर राजद के साथ गठबंधन करेंगे? हाल की घटनाओं और बयानों ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है। आइए, इस राजनीतिक परिदृश्य को विस्तार से समझते हैं।
चर्चा की शुरुआत कैसे हुई?
इस चर्चा का मुख्य कारण केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का हालिया बयान है। जब उनसे पूछा गया कि बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए का मुख्यमंत्री उम्मीदवार कौन होगा, तो उन्होंने नीतीश कुमार का नाम नहीं लिया। अमित शाह ने कहा, “यह फैसला एनडीए का होगा, जिसे मंच पर अभी बताना संभव नहीं।”
अमित शाह के इस बयान के बाद जदयू ने भाजपा पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। जदयू के प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा के आवास पर आनन-फानन में बिहार एनडीए की बैठक बुलाई गई। इसके बाद भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही एनडीए चुनाव लड़ेगी और वह ही मुख्यमंत्री उम्मीदवार होंगे।
नीतीश कुमार की नाराजगी
इस राजनीतिक परिदृश्य के बीच, बिहार बिजनेस समिट 2024 में नीतीश कुमार की अनुपस्थिति ने नई चर्चाओं को जन्म दिया। इस समिट में 300 कंपनियों ने बिहार सरकार के साथ 1.80 लाख करोड़ का समझौता किया। नीतीश कुमार की गैरमौजूदगी को उनकी सेहत खराब होने से जोड़ा गया, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे नाराजगी का संकेत माना।
भाजपा के भीतर विरोधाभासी बयान
गिरिराज सिंह का बयान: केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि नीतीश कुमार को भारत रत्न से सम्मानित किया जाना चाहिए। इसे भाजपा का एक इशारा माना गया कि वह नीतीश कुमार को राजनीति से संन्यास लेने और मार्गदर्शन मंडल में शामिल होने का संकेत दे रही है।
विजय सिन्हा का बयान: बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा ने कहा कि बिहार में भाजपा की सरकार बनाना ही पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। हालांकि, बाद में उन्होंने सफाई दी कि उनका मतलब गलत निकाला गया और नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री रहेंगे।
राजद का ऑफर
राजद के प्रवक्ता भाई विरेंद्र ने नीतीश कुमार के लिए महागठबंधन का दरवाजा खुला होने की बात कही। उन्होंने कहा कि राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता। समय के साथ समीकरण बदलते हैं।
राज्यपाल की नियुक्ति
हाल ही में केंद्र सरकार ने बिहार में नया राज्यपाल नियुक्त किया। केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को बिहार भेजा गया, जबकि बिहार के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर को केरल स्थानांतरित किया गया। इसे भी राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
भाजपा का दबाव और नीतीश का पाला बदलने का इतिहास: नीतीश कुमार अतीत में एनडीए और महागठबंधन दोनों का हिस्सा रह चुके हैं। अगर भाजपा का दबाव बढ़ता है, तो उनके पाला बदलने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, उनकी विश्वसनीयता पर सवाल जरूर उठेंगे।
भाजपा की रणनीति: भाजपा जदयू को कमजोर करने की कोशिश कर सकती है। जदयू विधायकों को तोड़ने या पार्टी को विभाजित करने की संभावना भी राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा जताई जा रही है।
नीतीश कुमार की वर्तमान स्थिति: नीतीश कुमार अब पहले जैसे सक्रिय नहीं हैं। राजद के साथ दो बार गठबंधन करने के बाद, तीसरी बार ऐसा करने पर उनकी छवि को नुकसान हो सकता है।
बिहार की राजनीति में उठापटक का दौर कोई नई बात नहीं है। नीतीश कुमार को अपनी राजनीतिक चाल बहुत सोच-समझकर चलनी होगी। भाजपा और राजद दोनों अपनी-अपनी रणनीति के तहत नीतीश कुमार को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि नीतीश कुमार का अगला कदम क्या होगा।





