Bole Bharat Times, State Desk: छत्तीसगढ़ में सच्चाई की आवाज़ उठाने वाले 28 वर्षीय युवा पत्रकार मुकेश चंद्राकर की निर्मम हत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। मुकेश की केवल यही गलती थी कि उन्होंने ठेकेदार और एक कांग्रेस नेता के कथित भ्रष्टाचार को उजागर करने की कोशिश की थी। उनकी रिपोर्टिंग के बाद, एक सड़क निर्माण परियोजना में हुए 120 करोड़ रुपये के घोटाले की जांच शुरू हुई। लेकिन यह सच्चाई उजागर करना उनकी जान पर भारी पड़ गया।
कैसे हुआ यह मामला?
कुछ दिन पहले, मुकेश ने एक सड़क निर्माण परियोजना की क्वालिटी पर सवाल उठाए थे। यह परियोजना ठेकेदार सुरेश चंद्राकर द्वारा चलाई जा रही थी। उनकी रिपोर्टिंग के कारण इस परियोजना पर जांच बैठाई गई। इसके बाद, ठेकेदार के भाई नरेश ने मुकेश को मिलने के लिए बुलाया।
शुक्रवार शाम को मुकेश की लाश ठेकेदार के घर में बने एक सेप्टिक टैंक से बरामद हुई। उनकी पीठ पर घावों के गहरे निशान थे, और लाश को कंक्रीट से ढक दिया गया था। यह हत्या न केवल एक सोची-समझी साजिश को उजागर करती है, बल्कि भारत में पत्रकारों के खिलाफ बढ़ती हिंसा की भी गंभीर तस्वीर पेश करती है।
साहसिक पत्रकारिता के प्रतीक थे मुकेश
मुकेश चंद्राकर उन चंद पत्रकारों में से थे जो बड़े स्टूडियो और चर्चाओं से दूर, जमीन पर रहकर जनता की आवाज़ बनने का काम करते थे। दो साल पहले, मुकेश ने बस्तर के घने जंगलों में नक्सलियों के चंगुल से CRPF के जवानों को छुड़ाने में अहम भूमिका निभाई थी। उनका काम केवल खबरें रिपोर्ट करना नहीं था, बल्कि समाज के लिए बदलाव लाना था।
पत्रकारों पर हमले: सच्चाई की कीमत
मुकेश चंद्राकर की हत्या कोई अलग घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में, गौरी लंकेश, शुजात बुखारी और रामचंद्र छत्रपति जैसे सच्चाई के लिए लड़ने वाले कई पत्रकारों की निर्मम हत्या हो चुकी है। यह घटनाएं इस सवाल को जन्म देती हैं. क्या लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को खत्म करने की साजिश रची जा रही है?
क्या जनता जागेगी?
भारत में पत्रकारिता का धर्म निभाना अब सबसे बड़ा अपराध बनता जा रहा है। पत्रकार डर के साये में काम कर रहे हैं, और जनता खामोश है। जो लड़ रहे हैं, उन्हें मार दिया जा रहा है। सवाल यह है कि क्या जनता जागेगी और पत्रकारों को वह सुरक्षा देगी, जिसके वे हकदार हैं?
मुकेश को इंसाफ कब मिलेगा?
मुकेश चंद्राकर की हत्या का सच अब पूरे देश के सामने है। क्या सरकार और न्यायपालिका इस पर ठोस कार्रवाई करेंगे? या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा?
मुकेश चंद्राकर की मौत ने यह साबित कर दिया है कि सच्चाई की राह आसान नहीं है। लेकिन इस सच्चाई के लिए लड़ने वाले हर पत्रकार को सुरक्षा देना हमारे समाज की ज़िम्मेदारी है।






