लालू- तेजस्वी के लिए कांग्रेस बनी मजबूरी,अब क्या करेगा महागठबंधन

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: दिल्ली नतीजों के बाद बड़ा खेला
: लालू- तेजस्वी के लिए कांग्रेस बनी मजबूरी
: नहीं समझे तेजस्वी तो राह होगा मुश्किल
: अब क्या करेगा महागठबंधन
: आप को बताएंगे कांग्रेस राजद के लिए मजबूरी क्यों
: इतना ही नहीं आगे ये भी बताएंगे
: बिहार में क्यों हुई है कांग्रेस की दुर्गति

 

Patna: दिल्ली में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी की सीटें आधी से भी कम यानी 62 से 22 पर पहुंच गईं। कांग्रेस का तो खाता भी नहीं खुला। यहां ‘AAP’ और ‘कांग्रेस’ अलग-अलग चुनाव लड़ीं। नतीजा सबके सामने है। अरविंद केजरीवाल तक हार गए।

AAP 14 सीटों पर कांग्रेस के कारण हारी। कांग्रेस के साथ लड़ती तो इन सीटों को जीतती। इससे ये संकेत मिले हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव में RJD ने कांग्रेस से दूरी बनाई तो उसे भी केजरीवाल की तरह नुकसान उठाना पड़ सकता है।

‘दिल्ली में अगर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी एक साथ लड़ते तो आज आंकड़े अलग हो सकते थे। AAP को जो नुकसान हुआ है, वह कांग्रेस की ही देन है।’

अभी तक बिहार में RJD और कांग्रेस साथ मिलकर ही चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं, लेकिन दो ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर दोनों के बीच अंदरूनी खींचतान है।

लालू ने ममता का समर्थन किया

इंडिया अलायंस का नेतृत्व करने के लिए लालू यादव ने ममता बनर्जी के नाम का समर्थन किया है। इस बयान के बाद बिहार कांग्रेस के लालू विरोधी नेता एक्टिव हो गए थे और दिल्ली में अकेले लड़ने की पैरवी कर रहे थे। हालांकि, राहुल गांधी ने 18 जनवरी को राबड़ी आवास पहुंचकर एकजुटता दिखाने की कोशिश की।

सीट शेयरिंग पर फंसेगा पेंच

2020 में कांग्रेस के लचर प्रदर्शन के कारण लालू और तेजस्वी यादव ने 2024 में मनमाने तरीके से फैसले लिए। करीबी नेताओं से ये मैसेज भी दिलवा रहे हैं कि इस बार हम कांग्रेस की सीटें कम करेंगे। लेकिन दिल्ली नतीजों के बाद RJD को सोचना पड़ सकता है।

आखिर RJD कांग्रेस की सीटें घटाना क्यों चाहती है?

बहुत संभव है कि कांग्रेस को पिछली यानी 2020 विधानसभा चुनाव से भी कम सीटें दी जाएं और माले की सीटें कुछ बढ़ाई जाएं, क्योंकि पिछले चुनाव में कांग्रेस से अच्छा स्ट्राइक रेट माले का रहा था।

आंकड़ों के जरिए इसे समझते हैं। बिहार में विधानसभा की 243 सीटें हैं। 2020 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 70 सीटें दी गईं थी और वो महज 19 सीटें जीत पाई। इसमें से भी दो विधायक बाद में बीजेपी में चले गए। RJD 144 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, इसमें से 75 सीटें जीती।

माले 30 में से 12 सीटें जीत गई। महागठबंधन महज 10 सीटों से मेजोरिटी में आने से रह गया। इसका सबसे बड़ा गुनहगार कांग्रेस को माना गया, क्योंकि सबसे कम स्ट्राइक रेट कांग्रेस की ही रही। दिल्ली में कांग्रेस ठीक प्रदर्शन करती तो बिहार में सीटें बढ़ाने को लेकर दबाव बना सकती थी लेकिन अब शायद ऐसा करने से बचेगी।

3 पॉइंट में कांग्रेस RJD के लिए मजबूरी क्यों

वोटों का बंटवारा न हो

बिहार में 17 फीसदी माइनोरिटी हैं। ये लालू के कोर वोटर माने जाते हैं। हालांकि, सीमांचल में लालू पर कांग्रेस भारी है। ऐसे में दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ती हैं तो माइनोरिटी के वोट बंटेंगे। इससे NDA को फायदा होगा।

बीजेपी से लड़ना मुश्किल हो जाएगा

दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ती हैं तो मुकाबला त्रिकोणीय हो जाएगा। ऐसे में बीजेपी के संगठन के सामने RJD और कांग्रेस दोनों ही कमजोर हो जाएंगी। जबकि, आमने-सामने का मुकाबला रहा तो बीजेपी को चुनौती मिल सकती है।

अलग हुई तो तेजस्वी को भी चुनौती

कांग्रेस अलग चुनाव लड़ती है तो पप्पू यादव और कन्हैया कुमार जैसे चेहरों को एक्टिव कर सकती है। ऐसे में तेजस्वी यादव की लड़ाई और मुश्किल होगी क्योंकि कन्हैया कुमार का पब्लिक कनेक्ट तेजस्वी पर भारी पड़ सकता है।

3 पॉइंट में बिहार में कांग्रेस की दुर्गति क्यों

राज्य में 8 सालों से संगठन तक नहीं

पटना में सदाकत आश्रम यानी कांग्रेस का दफ्तर 1990 तक राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था, क्योंकि तब तक एक-दो बार छोड़ दिया जाए तो कांग्रेस का ही शासन रहा। लेकिन अब सदाकत आश्रम में आम लोगों को तो छोड़िए कांग्रेसियों की भीड़ तक नजर नहीं आती।

बिहार में 8 साल से पार्टी की वर्किंग कमेटी तक नहीं बनी। पार्टी के पास न कोई जमीनी नेता है और न ही कोई पॉपुलर नारा है, जिसके बदौलत सत्ता पक्ष के खिलाफ हुंकार भरी जा सके। पार्टी में बिहार के टॉप लीडर को लेकर पार्टी के नेता ही कहते हैं, ‘वे तो आलाकमान से ज्यादा किसी ओर के करीबी हैं और उन्हीं के इशारों पर सब करते हैं।’

सेंट्रल लीडरशिप एक्टिव नहीं

बीते 30 दिनों में राहुल गांधी दो बार पटना आए, लेकिन सिर्फ संविधान और जातीय जनगणना पर भाषण देकर लौट गए। पार्टी या संगठन को लेकर कोई इनिशिएटिव लेते नजर नहीं आए।

गर्दनीबाग में जो कैंडिडेट्स प्रदर्शन कर रहे थे, अचानक राहुल उनसे मिलने पहुंच गए। रा

हुल के जाने के बावजूद न यहां भीड़ थी, न ऐसा माहौल की किसी पार्टी का राष्ट्रीय नेता आया हो।

हालांकि, भीड़ न जुटने के कारण बाद में कांग्रेसियों को ही डांट खानी पड़ी लेकिन वे दबी जुबान से कह रहे थे कि हमें तो पता ही नहीं था कि राहुल जी वहां भी जाएंगे।

3. कांग्रेस पर मुस्लिम पार्टी का ठप्पा

पटना के सीनियर जर्नलिस्ट सुरेंद्र कुमार कहते हैं, ‘कांग्रेस मुस्लिमों की पार्टी बनकर रह गई है। हिंदूओं को निशाने पर लिया जाता है। आप राजनीति में हैं तो सांप्रदायिक संतुलन बनाना जरूरी है, यह कांग्रेस में पूरी तरह से मिसिंग है।’

” मुस्लिमों की बात करके उनके वोट तो लिए जा सकते हैं, लेकिन उनसे कभी सरकार नहीं बनाई जा सकती। कांग्रेस के पास कोई ऐसा पॉपुलर नारा ही नहीं है, जिससे वो कोई नैरेटिव सेट करती नजर आए। जैसे इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था, मौजूदा लीडरशिप के पास ऐसा कोई नारा नहीं है। संगठन को खड़ा करना तो दूर की बात है।

बीजेपी के पास एक बहुत मजबूत संगठन, एक मजबूत फीडबैक सिस्टम है। इसी का नतीजा है कि 2020 में दिल्ली में 8 सीटों पर सिमटने वाली बीजेपी इस बार 48 सीटों पर है।

2010 में अलग लड़े तो RJD 21 सीट पर आ गई

1990 के पहले तक अधिकतर वक्त कांग्रेस ने ही बिहार में राज किया है। 1990 में लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में जनता दल ने ही कांग्रेस को साफ किया था। 1995 में कांग्रेस को मुख्य विपक्षी पार्टी से हटाते हुए उसकी जगह बीजेपी ने ले ली।

साल 2000 में कांग्रेस अकेले चुनाव लड़कर महज 23 सीटें जीती। हालांकि, बाद में RJD के साथ मिलकर सरकार बनाई। 2005 में गठबंधन में चुनाव लड़े और कांग्रेस महज 9 सीटें जीत पाई।

2010 में फिर RJD-कांग्रेस अलग-अलग लड़े। RJD 21 और कांग्रेस 4 सीटों पर आ गई। 2015 में जब नीतीश-लालू और कांग्रेस ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा तब जरूर कांग्रेस 27 सीटें जीती।

हालांकि, 2020 के चुनाव में फिर 19 सीटों पर आ गई। अब बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष अखिलेश सिंह कह रहे हैं,, ‘लोकसभा में 9 में से 3 सीटें जीते हैं। राहुल जी ध्यान देंगे तो और अच्छा करेंगे’।

सच्चाई तो ये है कि बिहार कांग्रेस के दोनों टॉप लीडर पार्टी की एक्टिविटी के लिए ही उपलब्ध नहीं हो पाते। सेंट्रल लीडरशिप ग्राउंड लेवल पर एक्टिव ही नहीं है। राहुल गांधी सिर्फ भाषण देकर लौट जाते हैं। ऐसे में कांग्रेस एनडीए को कितनी टक्कर दे पाएगी, समझा जा सकता है।

ब्यूरो रिपोर्ट:  बोले भारत टाइम्स

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